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बॅकवर्ड एण्ड मायनॉरिटी कम्युनिटीज एम्प्लॉईज फेडरेशन

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मूलनिवासी संघ द्वारा धरना प्रदर्शन

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बामसेफ का 27 वाँ राष्ट्रीय अधिवेशन - 2010

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बामसेफ

27 वाँ राष्ट्रीय अधिवेशन - 2010

19 से 22 दिसम्बर 2010 (रविवार से बुधवार)

स्थानः पचायप्पास कॉलेज ग्राउण्ड, चेन्नर्इ (तमिलनाडू)

 

 

अपील

 

सम्मानित मूलनिवासी साथियों,

प्रतिवर्ष की भाँती बामसेफ का राष्ट्रीय अधिवेशन इस वर्ष दिसम्बर के अंतिम सप्ताह में चेन्नर्इ (तमिलनाडू राज्य) में आयोजित करणे का निर्णय संगठन ने लिया है। इस तैयारी के क्रम में हम निम्नलिखित बिंदूओं की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहते हैं। जैस आपको मालूम है की बामसेफ यह फुले-अम्बेडकरी विचारधारापर आधारित भारत निर्माण करने के लिए एक मिशनरी संगठन के तौर पर कार्य कर रहा है। राष्ट्रपिता फुले से लेकर आज तक इस लक्ष्य की प्राप्ति में सबसे बडा तथ्य अवरोधक के रुप में कार्य कर रहा है वह यह है की हमारे मूलनिवासी परिवार का 52 प्रतिशत जनसमुदाय अर्थात अन्य पिछडा वर्ग (ओबीसी) को ब्राह्मणवादी शक्तियाँ हिन्दूत्ववाद या राष्ट्रवाद के नामपर इस आंदोलन से दूर रखने के लिए लगातार गुमराह कर रही है। इसके परिणामस्वरुप अन्य पिछडा वर्ग कर्इ किस्म की समस्याओं से घिरहुआ है। वर्तमान में अन्य पिछडे वर्ग की समस्याएँ और उनकी संख्याशक्ती को स्पष्ट रुप से निर्धारित करने के लिए 2011 की जनगणना में उनकी जातीनिहाय समावेश होना आवश्यक है। ताकि अन्य पिछडे वर्ग की शैक्षिक, आर्थ्‍िाक, सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्र में विकास योजना के लिए वैज्ञानिकरुपसे मान्यताप्राप्त आँकडे उपलब्ध हो सकेंगे। क्योंकि 1931 बाद अन्य पिछडे वर्ग की जातीआधारित जनगणना नही हुर्इ है। अतः इस जनगणना से देश को एक सशक्त राष्ट्र बनाने में अन्य पिछडे वर्गों की भुमिका का निर्धारण भी सुनिश्चित हो सकेगा। विशेषतः आरक्षण के प्रतिशतपर उठे प्रश्नों का निराकरण भी हो जायेगा। इससे किसी राष्ट्रप्रेमी या हिंदुचिंतक को क्यों असहमत होना चाहिए।

इस तथ्यको समझते हुए भी हिन्दुत्ववादी झंडा बुलंद करनेवाली आरएसएस अन्य पिछडे वर्गोंको बरगलाने में लगी हुर्इ है। जबकि इसकी शक्ती का आधार ही अन्य पिछडा वर्ग है। आरएसएस का मानना है की जाती आधारित पहचान के लिए वर्तमान मांग सामाजिक विघटन को जन्म देगी। और देश में सामाजिक समरसता लाने के आरएसएस और अन्य सामाजिक संगठनों के प्रयासों को अप्रभावी करेगी। अपनी दलील में आरएसएस ने जो कारण गिनवाएँ है वह किसी भी तरहसे तर्कसंगत नही लगते। वह अन्य पिछडे वर्गों की संख्या की वैज्ञानिक मान्यता में अवरोध पैदा करने के आला कुछ नही हैं। इस कार्य से आरएसएस ने अन्य पिछडे वर्गोंके हितविरोधी अपने असली रुप को देश के सामने उजागर किया है। जहाँतक अनुसूचित जाति/ जनजाति की जनगणना का प्रश्न है, आरएसएस को इसमें कोर्इ आपत्ती नहीं है। आरएसएस ने कभी जातिविहिन समाज के निमार्ण का आन्दोलन नहीं चलाया। जातिअंतर्गत शादियाँ, जातिसूचक नाम-उपनाम जनेऊँ धारण करने की परंपरा आदि सभी कार्य उनकी जातिवादी विचारों की पराकाष्टा है।

वतर्मान की सबसे बडी राष्ट्रीय बहस अन्य पिछडे वर्गोंकी महिलाओं को महिला आरक्षण बिल में संख्या अनुपात के आधारपर प्रतिनिधित्व देनेके मुद्देपर चल रही है। यह बात समझ से परे है की भा.ज.पा., काँग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियाँ (तथाकथित हितचिंतक) अन्य पिछडे वर्ग के प्रतिनिधित्व को वर्तमान महिला आरक्षण बिल में शामिल क्यों नही करना चाहती? देश की स्थापित प्रचार मिडिया और यें तिनों पार्टियाँ अन्य पिछडे वर्ग की राजनैतिक शक्ती के खिलाफ घृणा फैलाने का अभियान चला रही है। यह बात उन्होंने आजतक स्पष्ट नहीं कि है की अन्य पिछडे वर्ग और अल्पसंख्यांक वर्ग ही 65 प्रतिशत महिलाओंने ऐसा क्या अपराध किया है की उनको आरक्षण से वंचित किया जा रहा है? जबकि उन्होंने 15 प्रतिशत सामान्य वर्ग की ब्राह्मणी वर्ग की महिलाओं के आरक्षण के लिए आसमान सिर पर उठा रखा है। वह यादव राजनितिज्ञ तिकडी (लालू, मुलायम, शरद) को उनकी पार्टियों में महिलाओं को आरक्षण देने की सलाह देकर वह इस प्रश्न से मुँह मोड रहे है। लेकिन उन्होंने स्वयं अपनी पार्टियों में महिलाओं को आजतक आरक्षण नही दिया, इसका उत्तर उनके पास नही है। उक्त तिनों पार्टियाँ (काँग्रेस, बिजेपी और कम्युनिस्ट) और मीडिया पिछडे वर्गोंके राजनितिज्ञोंको महिलाविरोधी घोषित कर रही है। जबकि यह समझ से परे है की देश की 85 प्रतिशत महिलाओं को राजनैतिक सत्ता और विधायिका में हिस्सेदारी दिलाने की माँग महिला विरोधी कैसे हो सकती है? केवल 15 प्रतिशत अगडी महिलाओंपर लक्षित आरक्षण की माँग समग्र महिलावर्ग के समर्थन में कैसे है? इसलिए बामसेफ ने राष्ट्रीय महत्व के उक्त विषयोंपर विस्तार से जनप्रबोधन करने का निर्णय लिया है। हमारा यह मानना है की बहुजन समाज की सभी समस्याओं समाधान तभी संभव है जब समस्त मूलनिवासी बहुजन एक पहचान के तहत संगठित होकर संघर्ष करेंगे। अतः मूलनिवासी बहुजन समाज, विशेषतः अन्य पिछडे वर्गों के मूलनिवासी भार्इयों और बहनों से निवेदन है की वें इस लडार्इ में बढ-चढकर शामिल होकर बामसेफ को तन-मन-धन से सहयोग करें और इस कार्य को सफल बनाएँ।

जयभीम! जय मूलनिवासी!!

फुले-अम्बेडकरी मिशन में आपका साथी,

डॉ. चंदु मैस्के

राष्ट्रीय महासचिव, बामसेफ

 

Last Updated on Friday, 03 December 2010 13:51
 

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